मुंबई में ज्ञान, साधना, सत्संग और सेवा से ओत-प्रोत हुई प्रेरणादायी संध्या

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*💥योग की ज्ञान-परंपरा का गंगा-सागर संगम*

*🌸मुंबई में ज्ञान, साधना, सत्संग और सेवा से ओत-प्रोत हुई प्रेरणादायी संध्या*

*✨परमार्थ स्कूल ऑफ योग एवं द योग इंस्टीट्यूट, मुंबई के संयुक्त 200-आवर योग शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम की 2027 से होगी शुरुआत*

*💦विश्व नदी दिवस पर पूज्य स्वामी जी का संदेश, नदियाँ हैं तो दुनिया है-जल नहीं तो जीवन नहीं*

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*🌿विश्व पर्यटन दिवस पर परमार्थ निकेतन से आह्वान- भारत का पर्यटन केवल देखने का नहीं, जानने, समझने और जीने का अवसर है*

*🌺हिन्दुत्व जागरण के प्रखर सूत्रधार, श्रद्धेय श्री अशोक सिंघल जी की जयंती पर भावभीनी श्रद्धांजलि*

मुंबई, 27 सितम्बर। भारत की सनातन संस्कृति में योग केवल शरीर को स्वस्थ रखने की साधना नहीं, बल्कि मन, प्राण, चेतना और आत्मा को परम सत्य से जोड़ने वाली जीवन-पद्धति है। इसी शाश्वत योग परंपरा, गुरु-शिष्य परंपरा और सेवा के पावन भाव को आगे बढ़ाने की दिशा में मुंबई में एक अत्यंत प्रेरणादायी एवं भावपूर्ण संध्या का आयोजन हुआ, जहाँ परमार्थ पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी, पूज्य माँ हंसाजी एवं पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती जी एवं का पावन सान्निध्य प्राप्त हुआ।

मुंबई स्थित द योग इंस्टीट्यूट में आयोजित यह संध्या ज्ञान, सत्संग, साधना, संस्कार और सेवा की ऐसी सुंदर अभिव्यक्ति बनी, जहाँ योग की प्राचीन भारतीय ज्ञानधारा ने आधुनिक विश्व के लिए एक नई दिशा का संदेश दिया।

परमार्थ पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने अपना आशीर्वचन प्रदान किए। पूज्य स्वामी जी ने योग को भारत की विश्व को दी गई महानतम आध्यात्मिक विरासतों में से एक बताते हुए कहा कि योग का संदेश केवल स्वस्थ शरीर का संदेश नहीं, बल्कि एकता, समरसता, शांति, करुणा और आत्म-जागरण का संदेश है।

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उन्होंने कहा कि आज जब विश्व अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब योग हमें स्वयं से, प्रकृति से और समस्त सृष्टि से पुनः जोड़ने का मार्ग दिखाता है। योग हमें अपने भीतर शांति खोजने की प्रेरणा देता है।

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि भारत की योग परंपरा का मूल भाव ‘मैं’ से ‘हम’ और ‘हम’ से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की यात्रा है। योग तभी पूर्ण है जब उसकी साधना सेवा में और सेवा करुणा में परिणत हो।

पूज्य माँ हंसाजी ने योगमय एवं आनंदपूर्ण जीवन के तीन अत्यंत सरल, किंतु गहरे सूत्र-मुस्कान, सम्मान और योगदान, साझा किए। उन्होंने कहा कि योग केवल आसन और प्राणायाम तक सीमित नहीं है; योग का वास्तविक उद्देश्य हमारे व्यवहार, विचार और जीवन में दिखाई देना है। जब जीवन में मुस्कान आती है तो वातावरण में आनंद आता है, जब सम्मान आता है तो संबंधों में माधुर्य आता है और जब योगदान की भावना आती है तो जीवन सेवा का माध्यम बन जाता है।

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पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती जी ने अष्टांग योग की गहन आध्यात्मिक यात्रा के विषय पर प्रेरणादायी उद्बोधन दिया। उन्होंने यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के माध्यम से योग को केवल अभ्यास नहीं, बल्कि आंतरिक स्वतंत्रता की यात्रा के रूप में समझाया।

उन्होंने कहा कि अष्टांग योग का प्रत्येक अंग साधक के भीतर चेतना के नए द्वार खोलता है। यम और नियम जीवन में शुद्धता और अनुशासन लाते हैं, आसन शरीर को साधना का माध्यम बनाता है, प्राणायाम प्राणशक्ति को संतुलित करता है और ध्यान एवं समाधि साधक को उसके वास्तविक स्वरूप की ओर ले जाते हैं।

उन्होंने कहा कि योग की यात्रा बाहर से भीतर की ओर जाने की यात्रा है, शरीर से श्वास तक, श्वास से मन तक, मन से चेतना तक और चेतना से आत्मबोध तक की दिव्य यात्रा है।

इस पावन अवसर पर पूज्य स्वामी जी ने योग के क्षेत्र में पूज्य माँ हंसाजी के दीर्घकालीन एवं अतुलनीय योगदान के लिये उन्हें रुद्राक्ष का पौधा एवं शॉल भेंट कर सम्मानित किया। माँ हंसाजी के सुपुत्र ऋषि जी एवं पुत्रवधू प्राणी जी को भी शॉल भेंट कर आशीर्वाद प्रदान किया गया।

आज विश्व नदी दिवस पर पूज्य स्वामी जी ने नदियाँ हैं तो दुनिया है का संदेश दिया। हिन्दुत्व जागरण के प्रखर सूत्रधार, श्रद्धेय श्री अशोक सिंघल जी की जयंती पर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने उन्हें स्मरण करते हुये कहा कि श्री अशोक सिंघल जी के साथ उनकी अनेक आत्मीय और प्रेरणादायी स्मृतियाँ जुड़ी हैं। जब परमार्थ निकेतन की ओर से वाराणसी में भव्य गंगा आरती का आयोजन किया गया, तब श्रद्धेय अशोक सिंघल जी का पावन सान्निध्य प्राप्त हुआ। उस अवसर पर मां गंगा के तट पर भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और राष्ट्र चेतना का एक अद्भुत संगम देखने को मिला।

पूज्य स्वामी जी ने श्रद्धेय अशोक सिंघल जी के योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि उनका जीवन सनातन संस्कृति, राष्ट्र चेतना और समाज जागरण के प्रति समर्पित रहा। उनके विचार, तप, त्याग और संकल्प आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरणा देते रहेंगे।

विश्व पर्यटन दिवस पर पूज्य स्वामी जी ने कहा, भारत का पर्यटन केवल देखने का नहीं, जानने, समझने और जीने का अवसर है। भारत में यात्रा केवल पर्यटन नहीं, बल्कि तीर्थाटन है; यह हमें प्रकृति, संस्कृति, आध्यात्मिकता और अपनी जड़ों से जोड़ते हुए भीतर की यात्रा पर भी ले जाती है।

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