हिमालय है तो हम हैं, हमारी संस्कृति, सभ्यता और सुरक्षा का आधार

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हिमालय है तो हम हैं, हमारी संस्कृति, सभ्यता और सुरक्षा का आधार
हिमालय, पृथ्वी का मौन उपनिषद्
स्वामी चिदानन्द सरस्वती
ऋषिकेश, 9 सितम्बर। हिमालय दिवस के अवसर पर परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने अपने संदेश में कहा कि हिमालय, केवल पर्वत-शृंखला नहीं, बल्कि भारत की जीवन-परंपरा, आध्यात्मिक चेतना और भविष्य की सुरक्षा का आधार है।
हिमालय की ऊँचाइयों पर जहाँ हिम शिखरों पर सूर्य की पहली किरण पड़ती है, वहाँ प्रकृति हमें संदेश देती है कि ऊँचा उठना और विनम्र बने रहना भी साधना है। हिमालय का मौन हमें धैर्य, स्थिरता और आत्मसंयम का संदेश देता है। वह बिना किसी अपेक्षा के नदियों को जन्म देता है, वनों को आश्रय देता है और असंख्य जीव-जंतुओं के जीवन का आधार बनता है। उसका अस्तित्व हमें स्मरण कराता है कि जीवन की महानता अपने लिए नहीं, सम्पूर्ण मानवता के लिए जीने में है।
हिमालय देवभूमि है, यहाँ प्रकृति और आध्यात्मिकता के बीच कोई अलगाव नहीं है। यहाँ पर्वत केवल शिलाएँ नहीं, तपस्या के प्रतीक हैं; नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं, जीवन और करुणा का प्रवाह हैं। हिमालय की गोद में स्थित तीर्थ, आश्रम और साधना-स्थल भारतीय संस्कृति की उस दृष्टि को जीवंत रखते हैं, जिसमें पृथ्वी को माता, नदियों को जीवनदायिनी और समस्त सृष्टि को एक परिवार माना है।
माँ गंगा की हर धारा हिमालय की उस मौन तपस्या का प्रसाद है, जो बिना कुछ माँगे सम्पूर्ण जीवन को सींचती है। गंगा का प्रवाह केवल जल का प्रवाह नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक स्मृति, आस्था और जीवन-व्यवस्था का प्रवाह है। हिमालय के हिमनद, बर्फ, वर्षा और वन मिलकर उन जल-स्रोतों को पोषित करते हैं, जिन पर कृषि, पेयजल, ऊर्जा और करोड़ों लोगों का जीवन निर्भर है इसलिए हिमालय का संरक्षण मां गंगा और उसकी सहायक नदियों के संरक्षण से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।

हिमालय की सुरक्षा का अर्थ केवल उसकी चोटियों की रक्षा करना नहीं, बल्कि उसके सम्पूर्ण पारिस्थितिक तंत्र को समझना है। वन, हिमनद, झीलें, नदियाँ, मिट्टी, वन्यजीव और स्थानीय समुदाय, ये सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। किसी एक कड़ी का कमजोर होना सम्पूर्ण जीवन-चक्र को प्रभावित कर सकता है। हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ता पर्यावरणीय दबाव, वनों का क्षरण, जल-स्रोतों का प्रदूषण और अनियोजित विकास हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करते हैं कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।
हिमालय को बचाना केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं, अपने भीतर के हिमालय, धैर्य, शुचिता और चेतना, को बचाना है। जब हम हिमालय की रक्षा करते हैं, तब हम अपने जल, अपने अन्न, अपनी जैव-विविधता और अपनी सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करते हैं। हिमालय भारत की प्राकृतिक सुरक्षा का भी एक महत्वपूर्ण आधार है। एक स्वस्थ हिमालय ही एक सुरक्षित और समृद्ध भविष्य की नींव रख सकता है। हमें ऐसी जीवनशैली अपनानी होगी जिसमें विकास हो, पर विनाश नहीं; सुविधा हो, पर संवेदनहीनता नहीं; और प्रगति हो, पर प्रकृति की कीमत पर नहीं।
हिमालय बचेगा, तो नदियाँ बहेंगी; नदियाँ बहेंगी, तो सभ्यता साँस लेगी। हिमालय बचेगा, तो हमारी संस्कृति की जीवनधारा बहेगी, हमारी कृषि सुरक्षित रहेगी, हमारी जैव-विविधता समृद्ध होगी और हमारी आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ जल, स्वस्थ पर्यावरण और सुरक्षित भविष्य प्राप्त होगा।
आइए, इस हिमालय दिवस पर हम संकल्प लें कि हिमालय है तो हम हैं, हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता और हमारी सुरक्षा है।

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