विभाजन की पीड़ा से सम्मान तक, टिहरी में याद किए गए विस्थापन के जख्म

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विभाजन की पीड़ा से सम्मान तक, टिहरी में याद किए गए विस्थापन के जख्म

पीएम मोदी की पहल से विभाजन पीड़ित परिवारों की सुध, सीएम धामी के नेतृत्व में टिहरी में सम्मान

अगस्त का महीना देश के लिए आजादी के उत्सव के साथ-साथ उन लाखों लोगों के संघर्ष और पीड़ा को याद करने का अवसर भी है, जिन्होंने वर्ष 1947 के विभाजन के दौरान अपना घर, जमीन, कारोबार और जन्मभूमि छोड़कर भारत को अपना नया घर बनाया।

विभाजन की इसी पीड़ा और संघर्ष को स्मरण करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2021 में प्रत्येक वर्ष 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की। प्रधानमंत्री की इस पहल से दशकों तक अपने भीतर दर्द और संघर्ष की स्मृतियां संजोए परिवारों की सुध लेने और उनकी कहानियों को सामने लाने का प्रयास शुरू हुआ।

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इस वर्ष मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उत्तराखंड में विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस को विशेष रूप से मनाया गया। टिहरी में भी विभाजन पीड़ित परिवारों की स्मृतियों और संघर्ष की कहानियों को सामने लाकर उन्हें सम्मानित किया गया। लंबे समय बाद इन परिवारों को लगा कि देश ने उनकी पीड़ा और संघर्ष को याद किया है।

टिहरी में बसे श्री देवप्रकाश सोनी व श्रीमती पूर्णिमा सोनी बताते हैं कि उनका जन्म पाकिस्तान के बालाकोट में हुआ था। उनके पिता स्वर्गीय ताराचंद सोनी का वहां जड़ी-बूटियों का कारोबार था। विभाजन के दौरान परिवार ने कठिन परिस्थितियां झेलीं। उनके मामा-मामी और तीन बेटों के भारत आने के दौरान हिंसक हमला हुआ, जिसमें मामी और एक बेटे की मृत्यु हो गई, जबकि अन्य गंभीर रूप से घायल हुए। भारत आने के बाद परिवार ने सहारनपुर, पंजाब, जम्मू-कश्मीर सहित विभिन्न स्थानों पर संघर्ष किया और अंततः टिहरी में अपना जीवन बसाया।

श्रीमती रंजीत कौर का जन्म पाकिस्तान के हजारा जिले के दरबंद गांव में हुआ था। वर्ष 1947 में उनकी उम्र महज डेढ़ वर्ष थी। परिवार को अपना सब कुछ छोड़कर भारत आना पड़ा। कठिन परिस्थितियों में जीवन शुरू करने के बाद आज उनका परिवार टिहरी में ‘प्रगति गारमेंट्स’ के नाम से कारोबार कर रहा है।

श्रीमती विनोद राय एवं स्वर्गीय गुलशन राय के परिवार ने भी विभाजन की भयावहता झेली। उनके पुत्र मनोज राय बताते हैं कि उनके परिवार को पाकिस्तान में राशन की दुकान और खेती छोड़कर रातोंरात भारत की ओर निकलना पड़ा। चिनाब नदी के किनारे सफर के दौरान हिंसक हमलों में कई लोग मारे गए और कुछ रिश्तेदारों ने जान बचाने के लिए नदी में छलांग लगा दी। परिवार पाकिस्तान से कश्मीर, पंजाब, दिल्ली, देहरादून होते हुए पुरानी टिहरी पहुंचा। मजदूरी, सब्जी बेचने और सिलाई जैसे काम कर परिवार ने जीवन को फिर से खड़ा किया और आज ‘शुभम साड़ी सेंटर’ के नाम से अपनी पहचान बनाई है।

श्रीमती गुलशन देवी विभाजन की स्मृतियां बताते हुए भावुक हो जाती हैं। वह बताती हैं कि उस समय उनके परिवार ने बहुत परेशानी झेली। परिवार पहले बरेली, फिर दिल्ली, ऋषिकेश और इसके बाद टिहरी पहुंचा। इस कठिन सफर के दौरान परिवार के लोगों ने रिक्शा चलाया और होटलों में काम किया। संघर्ष के लंबे दौर के बाद आज उनका परिवार टिहरी में सम्मानजनक जीवन जी रहा है।

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वहीं सरदार श्री मनमोहन सिंह पाकिस्तान से भारत आने की स्मृतियों को याद करते हुए बताते हैं कि उनके परिवार को अपना घर, व्यापार और सब कुछ छोड़कर भारत आना पड़ा। उस दौर की कठिनाइयों को याद करते हुए वे कहते हैं कि परिवार ने बहुत संघर्ष किया। वे सरकार का धन्यवाद करते हुए कहते हैं कि आज वर्षों बाद किसी ने उनकी और उनके जैसे परिवारों की सुध ली है।

अध्यक्ष पंजाबी बिरादरी श्री हरिकृष्ण लांबा बताते हैं कि उनके पिता अक्सर विभाजन के समय की भयावह घटनाओं का जिक्र करते थे। उनका पैतृक घर पट्टल, मानसेहरा, हजारा में था। वे बताते हैं कि यह ऐसी त्रासदी थी, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। विभाजन के दौरान परिवार को अपना घर-बार, कारोबार और सब कुछ छोड़ना पड़ा। उस अराजक दौर में सैकड़ों महिलाओं ने अपनी जान बचाने के लिए किशनगंगा नदी में छलांग लगा दी। उनका परिवार भी छिपते-छिपाते श्रीनगर पहुंचा, जहां से दिल्ली और फिर टिहरी आया। यहां उन्होंने कठिन परिस्थितियों के बीच नए सिरे से जीवन शुरू किया।

हरिकृष्ण लांबा की तरह प्रदीप कुमार, बलजीत राजपाल, राजकुमार नंद्राजोग, राकेश लांबा सहित टिहरी में बसे ऐसे अनेक परिवार हैं, जिन्होंने स्वयं या अपने पूर्वजों के माध्यम से विभाजन की उस भयावह त्रासदी को झेला। इन परिवारों की स्मृतियां आज भी उस दौर के दर्द, संघर्ष और साहस की गवाही देती हैं।

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इन परिवारों की कहानियां केवल विभाजन की त्रासदी नहीं, बल्कि साहस, संघर्ष और आत्मनिर्भरता की प्रेरक गाथाएं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में इन परिवारों को सम्मान मिलना इस बात का संदेश है कि देश ने उनकी पीड़ा और योगदान को भुलाया नहीं है।

विभाजन की विभीषिका झेलने वाली पीढ़ी ने अपना सब कुछ खोकर भी हिम्मत नहीं हारी। आज उनकी अगली पीढ़ियां भारत को अपना गौरव और टिहरी को अपना घर मानकर आगे बढ़ रही हैं। यही विभाजन की पीड़ा से नए जीवन और नए भारत के निर्माण तक की कहानी है।

जिला सूचना अधिकारी
टिहरी गढ़वाल

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