परमार्थ निकेतन से प्रवाहित संस्कारों की गंगा

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परमार्थ निकेतन से प्रवाहित संस्कारों की गंगा*

*अप्रवासी भारतीय परिवारों के लिये युवा पीढ़ी में संस्कारों के रोपण का केन्द्र परमार्थ निकेतन*

ऋषिकेश, 20 फरवरी। माँ गंगा के निर्मल तट पर स्थित परमार्थ निकेतन वर्षों से संस्कारों और सनातन संस्कृति की जीवंत धारा बनकर विश्वभर में भारतीयता का प्रकाश फैला रहा है। यहाँ से प्रवाहित होने वाली ‘संस्कारों की गंगा’ असंख्य जीवनों को स्पर्श कर रही है, विशेषकर उन अप्रवासी भारतीय परिवारों को, जो अपनी जड़ों से जुड़े रहने की पवित्र आकांक्षा लेकर भारत आते हैं।

आज वैश्वीकरण के इस युग में, जब भौतिक प्रगति तीव्र है परंतु सांस्कृतिक पहचान धीरे-धीरे धूमिल होती जा रही है, ऐसे समय में परमार्थ निकेतन युवा पीढ़ी के लिए आशा का दीप बनकर खड़ा है। यहाँ आने वाले बच्चों और युवाओं को आध्यात्मिक पर्यटन के अनुभव के साथ वे अपने अस्तित्व, अपनी परंपरा और वैदिक संस्कृति से साक्षात्कार करते हैं।

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गंगा जी के पावन तट पर प्रातःकालीन प्रार्थना, गंगा आरती, यज्ञ, दान, वैदिक मंत्रोच्चारण, ध्यान, योग एवं सत्संग के माध्यम से बच्चों के हृदय में सेवा, करुणा, अनुशासन और कृतज्ञता के संस्कार सहज ही अंकुरित होने लगते हैं। जब नन्हे हाथ यज्ञ में आहुति देते हैं, जब वे वेद मंत्रों का उच्चारण करते हैं, जब वे ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के भाव को आत्मसात करते हैं और उनके भीतर एक नई चेतना जन्म लेती है।

लंदन से आये परिवार परिवारों को भारतीय संस्कृति के विषय में जानकारी देते हुये स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि संस्कार केवल परंपराएँ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला हैं। शास्त्र केवल ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन के मार्गदर्शक दीप हैं और संस्कृति केवल उत्सव नहीं, बल्कि हमारी पहचान और हमारा स्वाभिमान है।

अप्रवासी भारतीय परिवारों के लिए परमार्थ निकेतन विशेष रूप से प्रेरणास्रोत है। विदेशों में पले-बढ़े बच्चे जब यहाँ आते हैं, तो उन्हें अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर मिलता है।

स्वामी जी ने कहा कि भारतीयता केवल भाषा या वेशभूषा नहीं, बल्कि विचार, व्यवहार और जीवन मूल्य हैं। ‘सेवा ही साधना है’ और ‘प्रकृति ही परिवार है’। परमार्थ निकेतन में बच्चों को दान और सेवा के कार्यों से जोड़ा जाता है, चाहे स्वच्छता अभियान हो, वृक्षारोपण हो, या जरूरतमंदों की सहायता। इससे उनमें समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित होती है। वे केवल अपने लिए नहीं, बल्कि ‘सबके लिए’ जीना सीखते हैं।

आज जब विश्व मानसिक तनाव, असंतुलन और दिशाहीनता से जूझ रहा है, ऐसे समय में सनातन जीवन-दृष्टि का यह केंद्र युवाओं को आंतरिक शांति, आत्मविश्वास और जीवन का उद्देश्य प्रदान कर रहा है। यहाँ का वातावरण उन्हें सिखाता है कि आधुनिकता और परंपरा साथ-साथ चल सकती हैं, विज्ञान और आध्यात्म विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

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स्वामी जी ने कहा कि संस्कार, शास्त्र और संस्कृति से जुड़ना अर्थात् अपनी जड़ों से शक्ति प्राप्त करना। यह जुड़ाव ही व्यक्ति को स्थिरता देता है, परिवार को एकता देता है और राष्ट्र को गौरव प्रदान करता है। जब हमारी युवा पीढ़ी अपने मूल्यों से जुड़ी होती है, तभी वह स्वयं से जुड़ सकती है।

लंदन से आये धनुष लोहिया ने कहा कि पूज्य स्वामी जी के पावन सान्न्ध्यि में परमार्थ निकेतन, माँ गंगा के तट से प्रवाहित यह संस्कारों की धारा आने वाली पीढ़ियों को इसी प्रकार आलोकित करती रहे यही हमारी प्रार्थना और संकल्प है।

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