विजया एकादशी के अवसर पर परमार्थ निकेतन में किया विशेष यज्ञ

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विजया एकादशी के अवसर पर परमार्थ निकेतन में किया विशेष यज्ञ*
‘एकादश इंद्रियों’ का संयम ही वास्तविक ‘एकादशी’*
ऋषिकेश। सनातन धर्म की कालजयी परंपराओं मेंयदि किसी एक तिथि को विशेष रूप से आत्मशुद्धि, साधना, तप और मोक्ष का द्वार कहा गया है, तो वह है एकादशी। ऋषियों की तपःपूत चेतना से उद्भव एक ऐसी आध्यात्मिक साधना-पद्धति है, जो हमें स्थूल से सूक्ष्म, देह से देवत्व और जीव से शिव की यात्रा पर अग्रसर करती है। वेद, पुराण, स्मृतियाँ और उपनिषद् सभी एक स्वर में एकादशी के व्रत को पाप-नाशिनी, पुण्य-वर्धिनी और मोक्ष-प्रदायिनी बताते हैं।
‘एकादशी’ अर्थात चंद्र पक्ष की ग्यारहवीं तिथि। हमारी दस इंद्रियाँ और एक मन, ये मिलकर ग्यारह होते हैं। इन्हीं ‘एकादश इंद्रियों’ का संयम ही वास्तविक ‘एकादशी’ है। यह व्रत केवल अन्न-त्याग नहीं, बल्कि इंद्रिय-निग्रह, मन-नियंत्रण और आत्म-उन्नयन की दिव्य साधना है। जब साधक अपने चित्त को विषय-वासनाओं से हटाकर ईश्वर में स्थित करता है, तभी एकादशी का वास्तविक फल प्राप्त होता है।
पद्म पुराण, स्कन्द पुराण और भविष्य पुराण में एकादशी के महात्म्य का विस्तृत वर्णन मिलता है। भगवान विष्णु स्वयं कहते हैं कि “एकादशी मेरा स्वरूप है।” इस दिन किया गया जप, तप, दान, ध्यान और व्रत सहस्र गुना फलदायी होता है।
चंद्रमा मन का कारक है, और एकादशी के दिन चंद्रमा की स्थिति ऐसी होती है कि मन अधिक संवेदनशील एवं चंचल हो जाता है। यदि इस दिन उपवास, ध्यान और जप किया जाए तो मन अद्भुत स्थिरता और शांति का अनुभव करता है।
‘उपवास’ शब्द का अर्थ है ‘उप’ अर्थात समीप, और ‘वास’ अर्थात निवास। अर्थात् ईश्वर के समीप निवास करना इसलिए एकादशी का व्रत ईश्वर-सान्निध्य का आनंद है। जब शरीर हल्का होता है, तब मन स्वतः अंतर्मुखी हो जाता है।
मास में दो बार पाचन तंत्र को विश्राम देना शरीर की शुद्धि के लिए अत्यंत लाभकारी है। इससे दोष संतुलित होते हैं, विषाक्त तत्व बाहर निकलते हैं और शरीर में नई ऊर्जा का संचार होता है। इस प्रकार एकादशी व्रत आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक तीनों स्तरों पर कल्याणकारी सिद्ध होता है।
आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में, जहाँ मनुष्य निरंतर तनाव, असंतोष और अशांति से ग्रस्त है, एकादशी का व्रत मानसिक संतुलन और आध्यात्मिक स्थिरता का अमूल्य साधन बन सकता है। यदि हम इस दिन कुछ समय स्वयं के लिए, ध्यान और प्रार्थना के लिए निकालें, तो जीवन में अद्भुत परिवर्तन संभव है। यह तिथि हमें बाहरी कोलाहल से हटाकर भीतर की शांति से जोड़ती है।
यह व्रत आत्मोत्थान की सीढ़ी, मोक्ष का द्वार और जीवन को पवित्र बनाने की आध्यात्मिक साधना है।

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