जून का महीना है, एक गहरी तपती हुई दोपहरी

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उपन्यास शिप्रा
जून का महीना है, एक गहरी तपती हुई दोपहरी है। सूरज की तेज गर्मी है, शरीर से तेजी से निकलता हुआ पसीना, ’’ऐसा लगता है कि शरीर से सारा का सारा पानी निकल चुका है, भरी दोपहर में वह अपने आपको थका हुआ पाता है। वह बिल्कुल अकेला बैठा है अपने केबिन में 1 बजे लंच करने के बाद, शिप्रा भी वापिस किचन मंे चली गयी है। वह चाहे तो आधे ’ाण्टे का आराम कर सकता है, परन्तु उसके मन में विचार कौंध रहे हैं।‘‘ यहां ऑफिस में तो वह बिल्कुल सुकून से है। शिप्रा सुबह से शाम तक उसका पूरा पूरा खयाल रखती है, वह उसकी व्यक्तिगत सहायक से कुछ ज्यादा ही है।
‘‘वह जब सुबह ऑफिस नौ बजे पहुँचता है, तो वह चाय लेकर आती हैं, 10 बजते हैं तो पानी, 11 बजते हैं तो चुकन्दर का जूस, पपीते का शेक या तो मेंगो शेक बनाती है। दोपहर एक बजते है तो लंच में वह रोज नयेदृनये प्रकार के व्यंजन बनाती है। लंच के 1 से 2 बजे तक वह केबिन में अकेला ही होता है। इसी समय दोपहर में वह भी चाहती है कि वह भी आराम करे। किचन में या फिर आफिस की बैंच पर लेट कर ही उसका एक सलीका है और उसके हाथ में पाककला का हुनर है।
पिछले छरू महीनों में उसके इन्हीं गुणों के कारण अनिकेत उसकी ओर खिंचा चला आया है। उसका एक आर्कषक व्यक्तित्व है, अपने काम को वह जितना मन लगाकर करती है उतना ही उसे सजना, संवरना, अच्छे से आर्कषक दिखना भी आता है। उसके रंगों का चयन भी बहुत अच्छा है। वैसे तो उसके गोरे रंग पर सारे के सारे रंग खिलते हैं। वह बहुत वाकपटु और संवेदनशील है, परन्तु उसे हर प्रकार की परिस्थितियों को अच्छे से संभालना भी आता है। किससे जुड़ना है, किससे दूरी बनानी है, वह अच्छे से जानती है। उसकी कुछ कमजोरियां भी है, वह अपने चारों ओर चापलूस लोगों का एक जमावड़ा भी चाहती हेै, अपनी प्रशंसा से वह फूली नहीं समाती है। लोग उसको बहका सकते हैं, दुनिया की चकादृचौंध उसे प्रभावित करती है। इन्हीं बातों से अनिकेत को ’ाबराहट होती है कि, ‘‘वह लालच में आ सकती है वह बहक सकती है‘‘, उसे अपने निर्णयों के लिए भी किसी न किसी का सहारा चाहिए होता है। उसके आसदृपास के लोगो की मंशा ठीक नही है, यह लोग भी उसके साथ कभी भी एक बड़ा षड़यन्त्र कर सकते हैं। परन्तु उसे विश्वास है कि शायद वह उसका सानिध्य पाकर वह अपने आप में बदलाव लायेगी। वह उसके अनुसार ढलने की कोशिश करेगी। एक अनन्य दोस्त वह पहले है उसकी एक अच्छी मित्र है। इसके बाद ही वह उसकी चाहत है। परन्तु वह काफी हद तक उसके करीब आ चुकी है। अब वह उससे दूर भी नहीं रह सकती है। दोपहर के समय वह अपने केबिन में, आराम से अपने बिस्तर पर लेटा हुआ है। बहुत से विचार उसके मस्तिश्क में गतिशील है। बहुत सी भावनाएं है, जिसके उतार चढ़ाव उसको प्रभावित कर रहे है। ‘‘वैसे तो पहले ही वें एक दूसरे के हो चुके हैं, परन्तु फिर भी वह आत्मचिंतन और आत्मनिरीक्षण से गुजर रहा है। शायद इस वक्त शिप्रा भी किचन मे बैंच पर लेटकर आराम कर रही है, उसने अंदर से परदे और दरवाजे को बंद कर लिया है। वह भी गहरी चिंता में है। कल जब वह अकेली थी, ‘‘तो इस आफिस से दूर जाना चाहती थी‘‘। आज जब अनिकेत उसके साथ है, तो वह उसके मन का हिस्सा बन चुका है, सोते, जागते, खातेदृपीते, दिनदृरात उसे अनिकेत का ही खयाल रहता है। पिछले दिनों उसने अनिकेत की अनुपस्थिति को गहरे से महसूस किया। वह उससे जितनी दूर होती जाती है, उतना ही वह उसे अपने करीब महसूस करती है‘‘। वह नहीं जानती है कि ‘‘क्यों वह उसके इतना करीब आयी है‘‘ ऑफिशियल दायरे में भी तो रहा जा सकता था, क्यों वे दोनों आजकल बहुत ज्यादा व्यक्तिगत हो गये हैं। क्यों उसके मन मे उसके प्रति इतनी गहरी भावनायंे जाग गयी हैं। क्यों उसे दुनिया में उससे ज्यादा और कोई महत्वपूर्ण नहीं लगता है। क्यों वह चाहती है कि वह उसके जीवन में आये। क्यों वह उसके साथ एक विशेष प्रकार की उर्जा महसूस करती है। वह महसूस करती है कि एक अलग ही तरह की शान्ति उसे उससे मिलती है। एक अपनापन, एक परिवार और कुछ अलग सा रिश्ता पनपा है इन दिनों में। अपने जीवन के तीन दशकों में उसने बहुत सी दुनिया देखी है, बहुत से उतार चढ़ाव देखे हैं, उसने दुनिया को समझा है, समाज के अंर्तमन में झांका है। दोनों में बहुत सी विविधताएं हैं किन्तु कई सामानताएं भी हैं। शायद ये ही ‘‘उसे उसकी ओर आकर्षित करती है‘‘, उसमें कोई अभिमान नहीं है, उसमें कोई सामाजिक विभेद नहीं हैं। वह आफिस मंे, समाज में सबको बराबरी की दृष्टि से देखता है। वह सबके दुखदृसुख में शामिल होता है। वैसे तो वह शिप्रा के सपनों का पुरूष है, जैसे कि हर स्त्री अपनी युवा अवस्था के बढ़ते दौर में सपनों में देखती है। उसकी इमानदारी, उसकी निष्ठा, पर उसे कोई शक नहीं है। वह लेटेदृलेटे अनिकेत के बारे मे सोचे चली जा रही है और सोचदृसोच कर उसकी आँखे नम हो जाती हैं। दोनो अलगदृअलग हैं। पर विचारों की एक निवृत श्रंखला उसके अन्दर चल रही है, नियति उन्हें कहाँ ले जाऐगी, उन्हें नहीं मालूम, उसे तो उसपर विश्वास है, उसी ने उसे भावनाओं के इस स्तर पर ले जा कर उसके करीब लाया है।

जून माह उत्तर भारत का सबसे गर्म महीना है, यह प्रचंड गर्मी लेकर आता है। चारों ओर चलती लू और गर्म हवायें बदन को झुलसा रही हैं। नदी दृ नाले आदमियों ने खोददृखोद कर गहरे कर दिये हैं। धरती के सीने से रेतदृबजरी निकाल लिया है, नदी का पानी अशुद्ध कर दिया। अब गर्मी होती है तो एक पत्ता भी नही हिलता है। उपर से फैक्ट्रियों से निकलती राख और धूल ने हवा को भी जहरीला बना दिया है, जिससे संास लेना भी दूभर हो गया है। जहँॅादृजहाँ जंगल हैं वहाँ वहाँ थोड़ी ठंडक है और गर्मी से राहत है, धरती बंजर हो चुकी है। आदमी तो आदमी जानवर भी राहत के लिए इधरदृउधर भटक रहै हैं।
सुबह के 8 बजते ही सूरज सर पर चढ़ आता है और गर्मी से पूरा बदन झूलसने लगता है । वह कोशिश करता है कि सुबह जल्दी से जल्दी अपने ऑफिस पहुंचे और गर्मी से उसे कुछ राहत मिले। शिप्रा तो और भी लम्बा सफर तय करके आतीहै। वह एक महिला है, उसकी हिम्मत की दाद देनी पडे़गी, पिछले कुछ वर्षों से वहलगातार इन कठिनाइयांे को झेल रही है या शायद उसने अपनी सामाजिक समस्याआंे को निपटाने के लिए एक खोल तैयार कर लिया है जिसका उसे आर्थिक लाभ भी मिलता है। वह एक ’ारेलु महिला बनकर नहीं रह सकती है, या उसकी मजबुरियां ही उसे ऐसा करने से रोकती हैं। ऐसा नहीं है कि उसे प्रेम, परिवार, और सम्बन्ध समझ में नहीं आते हों, इस धरती का सबसे खतरनाक जीव तो मनुष्य ही है। वही तो स्वार्थवश सभी एकदृदूसरे को नोचने और खसोटने पर लगें हैं। शिप्रा यह जानती है कि दुनिया बहुत आसान नहीं है, लोग समबन्धो में विश्वास की आड़ लेकर ही धोखा करते हैं। ‘‘व्यक्ति वहीं छला जाता है जहाँ बहुत ज्यादा नज़दीकियां होती हैं‘‘। इसलिए वह अपना हर कदमदृफूंक फंूक कर रखना चाहती है, परन्तु उसने जितना भी जाना है, जितना भी परखा है, अनिकेत उन सबसे कुछ अलग है। वह यूहीं ही नही उसकी ओर आकर्षित हुई है। ऐसा सोचते दृसोचते वह गहरे ख्यालों में उतरती चली जाती है। धीरेदृधीरे जून के महीने का पहला हफ्ता गुजर जाता है। ऑफिस में काफी व्यवस्ताएं है, वे एक दूसरे को समझने में लगे हैं, परन्तु सब कुछ नेपथ्य मंे चल रहा है। वे एक दूसरे के बहुत करीब आ चुके हैं। परन्तु आंतरिक रूप में एक दूसरे को समझ रहे हैं, पुरानी बातें, पुराने अनुभव, एक दूसरे के जीवन के पहलु आमनेदृसामने रख रहे हैं। शिप्रा को एक प्रकार का आर्कषण अनिकेत के लिए चौबिसों घन्टे बना हुआ है।
‘‘वह उससे बताती है कि पिछले चारदृपाँच साल से उसका वजन 20 किलो से ज्यादा वजन बढ़ गया है‘‘, वरना तो वह कभी छरछरे बदन वाली लड़की थी। वह उसको वाट्सएप पर पिछले दोदृतीन सालों कीे अपनी खूबसूरत फोटो भेजती है। शायद वह बहुत आकर्षक लग रही, वह बताती है कि ‘‘उसमें भी इच्छा है कि वह भी आधुनिक दिखे, ऐसा नहीं है कि उस पर ऐसी ड्रैस फबती नहीं है‘‘, उसे विश्वास नहीं होता है तो, वह कहती है कि वह जब अपनी पुराने फोटो लेकर आऐगी तो उसे दिखाए गी। अगले दिन वह उसके साथ वापस लौट रही है, ये दोनों वस स्टैंड के पास आकर रूकते हैं, वह अपने बैग खोलती है और फोटो निकालती है, टाप्स, जीन्स उपर से सर पर हैट, ‘‘सहसा अनिकेत को विश्वास नही होता कि यह उसी की फोटो है‘‘, जिसमें वह बिलकुल छरछरे बदन और तीखे नयनदृनकश वाली बहुत ही खूबसूरत, बिल्कुल बॉलीवुड की हिरोइन जैसी दिख रही है। ‘‘उसने कहा कि, ‘‘वह भी बहुत फैशनेबल और आधुनिक रही है, परन्तु पारिवारिकदृसमाजिक और अपने आसदृपास कि वातावरण की वजह से उसे अब
ऐसे ही रहना पड़ रहा है‘‘। शाम के 5 बजे थेे, वह एक रेस्टोरेन्ट के सामने से गुजर रहे थे, थोड़ी भूख भी लगी थी, तो वे दोनों अन्दर की ओर चले गये और प्याज के पराठें का ऑडर दिया और साथ मंे चाय भी। आज वे दोनों पहली बार एक साथ किसी रेस्टोरेन्ट मे आये थे। वे दोनों अपने ही सपनांे के संसार में थे और एक मंजिल तलाश रहे थे। ये शायद उनकी की समीपता का पहला कदम था। जिसे वे आज दोनों एक साथ बढ़ा रहे थे। जैसे ही बैरे ने परांठे और चाय लाकर टेबल पर लाकर रखी। अनिकेत ने परांठा उठाकर उसमें से एक टुकड़ा तोड़ा और शिप्रा की ओर बढ़ाया तो उसने मुँह खोलकर उसे स्वीकार किया और उसके पश्चात उसने भी एक टुकड़ा उठाकर अनिकेत को खिलाया। ‘‘ये उनके पहले प्यार का पहला इज़हार था‘‘। फिर अनिकेत ने चाय का कप उठाया और उसके होंठो से लगाया फिर उसने भी खुद उसके कप में से चाय पी और फिर दुबारा से उसी कप से एक और सिप शिप्रा ने लिया। इस प्रकार से ये उनके प्यार का पहला दिन बन गया था। आज से वे एक ही हो चुके थे ऐसा वे दोनो महसूस कर रहे थे।
बैठेदृबैठे ऑधे से ज्यादा समय वे एक दूसरे की ऑखों में ही झांकते रहे, ऐसा लगता था कि उनके मुहँ और कान बातों मे व्यस्त थे और आँखें एक दूसरे के मन को पहचानने में लगी थीं, ‘‘कब, कौन से जीवन में वें साथदृसाथ थे। यह कोई उनका पहला प्यार या पहला जन्म नहीं था। वे जानते थे कि नियति ने ही उन दोनों को यूँ ही नहीं मिलाया है। वह ही उन्हें इस जगह तक ले कर आयी है‘‘, दोनों ने चाय परांठा खत्म किया और बाद में अनिकेत ने दो गुलाब जामुन मंगवाएं और फिर से ‘‘उसने शिप्रा से पूछा कि उसे और कुछ खाना है क्या‘‘ परन्तु शिप्रा ने मना कर दिया, अनिकेत ने काउंटर पर जाकर एक पानी की बोतल ली और पैसे चुकाये फिर वे दोनों होटल से बाहर निकल आये।
फिर आगे वे मार्केट से गुजरते हुए चौराहे तक आ पहँुचें और वहां से दोनों ने अलगदृअलग ऑटो लेकर अपनेदृअपने रास्ते की ओर निकल गये। दिल में एक गहरा अहसास था। और मन में असीम शान्ति। शिप्रा ने चलतेदृचलते हुए हाथ हिलाया और कहा कि ‘‘कल सुबह फिर से मिलेंगें‘‘।
अब उसका ऑटो आगे की ओर बढ़ता जा रहा था, परन्तु उसका दिल अनिकेत के साथ पिछे की ओर ही छूट गया था। आज उसने महसूस किया कि अब वह अकेली नहीं है, अनिकेत का साथ अब उसके साथ हमेशा दृ हमेशा ही रहेगा। ये एक ऐसा सपना था, जो कि उसने बहुत पहले कभी देखा था और जो आज आकर साकार हुआ। अनिकेत की यादों से उसके शरीर में एक कम्पन सा था। उसकी उंगलियां उसे अपने होंठों का छूते हुए महसूस हो रही थी। कैसे उसने परांठें का पहला कोर उसके मुहँ में रखा, कैसे वो पहला चाय का कप पीया। अनिकेत के होंठों को छुकर उसके होंठांे तक पहुँचा था। वह शायद इन्हीं लम्हों को बार बार अपने मन में दोहरा रही थी। यह तो प्रमाण थ। कि अनिकेत भी अब उसको, उसी की तरह से चाहने लगा है। ‘‘शर्म, हया और असमंजस्य की दिवारें धीरेदृधीरे टूट रहीं हैं, शिप्रा के मन की मिट्टी धीरेदृधीरे अनिकेत के प्रेम को सोख रही है, जिसके वजह से अब वह फूले नहीं समा रही थी‘‘। पिछले दिनांे ही पूर्णिमा ने उसके जन्मदिन की वीडियो उसे वाट्सेप पर भेजी थी, जिसमें वह केक काटती है और फिर अनिकेत केक का टुकड़ा उसके मूँह में रखता है और केक कुछ उसके गालों पर लगा देता है, बहूत ही आत्मिक क्षणों के अनुभव हैं, मन खिल उठता है, परन्तु सबकुछ सार्वजनिक है, कुछ भी छिपा नहीं है। सबने ऑफिशियल से आत्मिक होते हुये होते हुए दोनों के प्यार को देखा है। वह बारदृबार इस सीन को रीपीट करके देखती है। हर बार वह उसे कुछ अलग सा ही लगता है, हर बार वह अनिकेत के प्यार में और गहरे से उतरती जाती है। जिस प्रकार से ये जून का पहला हफ्ता गुजर गया पता ही नहीं चला। आज शुक्रवार का दिन है आज रात को अनिकेत को फिर से ’ार की ओर निकलना है और फिर से दोदृतीन दिन के लिये उसे उसके बगैर ही रहना पडे़गा। यह सोचकर वह गहरे अवसाद में डूब जाती है। अभी तक तो वह सुनहरे ख्वाबों में डूबी थी और सुनहरे सपनों मंे दोनांे को देख रही थी। अचानक से सपना टूटता है, वह अपने आप को अपने ’ार के करीब पाती है, ऑटोवाला बोलता है कि ‘‘मैडम आपका स्टॉप आ गया है‘‘। वह धीरेद धीरे अपने घर की तरफ बढ़ती जा रही है, बिल्कुल मायूस और शान्त। कुछ मिनटों पहले वह अनिकेत एक साथ रेस्टोरेन्ट मं थी, अनिकेत ने अपने हाथों से परांठा खिलाया और अपने हाथों से चाय सर्व की। अभीदृअभी उसमें एक युगल की उर्जा थी और वह फिर से अकेली हो गयी है, अगले दोदृतीन दिन के लिए। उसने अपने मन को संभाला, अगले तीन दिन उसे अनिकेत के बिना ही गुजारने पडे़गं। याद तो अनिकेत को भी बहुत आयेगी, परन्तु वह एक पुरूष है हमेशा संयत होकर चलता है।
उसके मन में भी शिप्रा की एक खुबसूरत प्रतिमा जन्म ले चूकी है, जो कि ‘‘उसे उससे भी ज्यादा आकर्षित करती है, कल्पनाओं का तूफान उसके मन से भी गुजर रहा है। उसके मन की दिवारंे भी ढह चुकीं हैं, वह भी आसक्ति की भयंकर उर्जा को महसूस कर रहा है, स्त्री और पुरूष में सम संवाद है, वह जानता था, परन्तु इतना खिचांव भी हो सकता है वह पहली बार महसूस कर रहा है‘‘। शायद कभी न दिखने वाले इलैक्ट्रान बहुत तेज गति से दौड़ते हैं यह तो विद्युत का झटका लगने पर ही पता चलता है। जैसेद जैसे वोलटेज़ बढ़ती जाती है वैसेदृवैसे बिजली झटका न देकर अपनी ओर खिंचने लगती है। वह भी ऐसा ही महसूस कर रहा है, शिप्रा की शक्ति, शिप्रा का सम्मोहन कोई अचानक घटित होने वाली ’घटना नहीं है। वह तो कब से उसे अपनी ओर खींच रही थी और अब तो जैसे उसने अपना प्रतिकर्षण को त्यागकर उसकी ओर समर्पित कर दिया है और उसने प्रेम के प्रवाह की दिशा के साथदृसाथ ही बहना स्वीकार कर लिया है। चाहे इसकी परिणिती कुछ भी हो। वह अब धीरेदृधीरे अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहा था, परन्तु आज के आत्मिक क्षणों की समिृतियां उसके दिमाग में थी और बारदृबार आ रहीं थी और वह उन्हें दोहरा रहा था। उसकी आँखों में भविष्य के सपनें उसे एक नया संसार दिखा रहे थे। वह न चाहते हुए भी ना जाने क्यांे बारदृबार, इन सपनों में डूबता ही जा रहा था। ऐसा क्यों हो रहा है, ‘‘आज उसकी समझ से परे था‘‘। परन्तु वह तो उसका हो चुका है, यह बात वह अच्छे से जानता है। वह भी उसके मोहपाश में बंधती ही जा रही है, ‘‘इस बात को वो भी अच्छी तरह से समझ रही थी‘‘। शēदों का आभाव था परन्तु भावानाएं खुद बोल रही थी, वह जानता था कि दिन भर शिप्रा उसके साथ के लिए आतुर रहती है। चाहे वह कितनी भी व्यस्त क्यांे न हो, परन्तु वह अपना समय निकाल ही लेती है। पहले उसे ऑफिस ’ार निकलने की जल्दी होती थी, परन्तु आजकल वह देर शाम तक उसके फ्री होने का इंतजार करती है तथा उसके साथदृसाथ ही निकलती है। वह चाहती है कि अंतरंगता के कुछ क्षण और मिलें। कुछ ऐसी बातें हांे जो उसके मन की सारी पीड़ाओं को हर लें। अब वह अपने अतित के दुखों से छुटकारा पाना चाहती है। वह चाहती है कि वह उसमंे इतना डूब जाये कि उसके अतित के सारे रंग उतर जाएंे, उस पर केवल एक रंग चढे़ वो केवल अनिकेत का ही हो। ख्वाबांे श्रंखला टूटी तो अनिकेत अपने कमरे पर पहुँच चूका था। उसके पास आराम के लिए केवल एक ही घण्टा बचा था, फिर से उसे तैयार होकर रात की ट्रेन से वापस ’ार की ओर निकलना था। उसने शिप्रा को फोन किया तो ‘‘वह ’ार पहुँच चुकी थी‘‘, उसकी आवाज़ मे मासूमियत थी और एक गहरापन। वह शायद बहुत कुछ कहना चाहती थी, परन्तु एक पास शēद नही थे, ‘‘वह शायद निशēद हो चुकी थी‘‘। अनिकेत के सानिध्य ने उसकी सारी चंचलता, चपलता और शरारतें छीन ली थी। उसकी कैंची सी चलती ‘‘जुबान तो जैसे मूक हो गयी थी‘‘, वह अब गूंगी बहरी, मासूम सी गुड़िया हो गयी थी। कहते हैं कि ‘‘प्रेम को अभिव्यक्ति में नही बांधा जा सकता है, इसका स्वाद बहुत गहरा है, इसे केवल वही जान सकता है, जिसने इसको चख लिया हो और इसमें इतना गहरा आकर्षण होता है कि उसके सिवा और कुछ भी अच्छा नही लगता‘‘। यही हालात थे, इन दोनों के शिप्रा और अनिकेत के। इन दोनों में और बहुत सी सामानताएं थी और बहुत सी असामानताएं भी थीं जमीन और आसमान जैसी फिर भी दोनों एक साथ थे। ‘‘एक को चोट लगती तो दर्द दूसरे को महसूस होता, एक हंसता तो दूसरा खिलखिलाता। कौन क्या कहना चाहता है वें एक दूसरे के कहने से पहले ही जान लेते थे। धीरेदृधीरे दोनों ने एक दूसरे के मन को पढ़ना सीख लिया था। ऐसा लगता था कि वे केवल शरीर से ही अलग हैं वरना मन और आत्मा जो जैसे एक हो चुके हैं‘‘। अनिकेत को प्यास लगती तो, शिप्रा पानी लेकर हाजीर हो जाती है। उसे भूख लगती तो खाना उसकी टेबल पर हाजिर था, चाय की इच्छा होती तो चाय। वह पलदृपल उसके मन में चल रहे विचारों को पढ़ लेती, अब वह समझ चुकि थी ‘‘कबदृकब उसे क्या चाहिए‘‘, अब वह केवल उसकी व्यक्तिगत सहायक न होकर उसके मन की भी सहायक हो गयी थी। उसने उस के साथ इतना अनुभव ले लिया था, अनिकेत के मन का पूरा का पूरा नियंत्रण ही शिप्रा के हाथ मंे हीे था। अनिकेत ने बात समाप्त की तो, शिप्रा के हाथों मंे कम्पन था और शरीर में अजीब तरह की तरंगे, उसके मुहँ से कुछ निकल ही नहीं रहा था, उसने केवल उससे इतना ही कहा कि ‘‘हैप्पी जर्नी‘‘ ‘‘अपना ख्याल रखना‘‘ और जल्दी से लौट कर आना। वह उसका इंतजार करेगी, बीचद-बीच मंे समय मिले तो कॉल करना।

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